Saturday, May 22, 2010
ये सुबह फिर न आए, आए तो मै न रहूं
Sunday, April 4, 2010
सानिया-शोएब मामले पर बौना हुआ भारतीय कानून
यह सही है कि हर आरोपी येन केन प्रकारेण खुद पर लगे आरोपों से बचाव के तौर-तरीके अपनाता है। कानून के जानकार और मोटी फीस लेकर सलाह देने वाले वकील उसे बचाने के लिए ऐडी से चोटी तक का जोर लगा देते हैं। लेकिन अंतिम निर्णय न्यायालय ही सुनाता है। सानिया-शोएब मामला शायद न्यायालय और इससे नीचे कानून के रखवालों (पुलिस) के लिए एक नया अनुभव होगा। इससे पहले इतना पेचीदा प्रकरण कभी सामने नहीं आया। यह सवाल अब भी अनुत्तरीत है कि शोएब (पाकिस्तानी) विदेशी नागरिक है। उसके खिलाफ भारत में एफआईआर दर्ज भले ही कर ली गई हो पर क्या भारत को उसके खिलाफ कार्रवाई करने के अधिकार है।
आजादी के बाद मुसलमानों के लिए भारत में मुस्लिम पर्सलन लॉ जरूर बना दिया गया लेकिन उसे सिर्फ एक सीमा तक लागू किया गया। इसे भारत में शरीयत कानून की तरह पूरी तरह लागू कर दिया जाता तो ऐसे मामलों में न्याय मिलना और न्याय दिला पाना सहज हो जाता। खुद पुलिस भी यह मान रही है कि एफआईआर तो दर्ज कर ली गई है पर आगे की कार्वाई कानून का अध्ययन करने के बाद ही संभव हो पाएगा। यह अध्ययन कितने दिन में पूरा हो जाएगा इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है।
Saturday, March 27, 2010
अखबार सिर्फ समाचार बेचते हैं
Wednesday, November 11, 2009
सभी कर्मचारी सच्चे
Saturday, October 31, 2009
धमाकों के धुंए से बदरंग हुई गुलाबी नगरी
Friday, October 23, 2009
प्लीज मुझे इन सवालों के जवाब दें
2. लोग मरने के लिए विषाक्त पदार्थ या जहर ही क्यों खाते हैं मिठाई क्यो नहीं खाते।
3. लोग दूसरों का बुरा करने के लिए गलत तरीका ही क्यों अपनाते हैं प्रेम से क्यों नहीं मारते।
4. धरती पर भगवान को पाने की लालसा होती है तो लोग स्वर्ग से नीचे ही क्यों आते हैं।
5. किसी ऐसे शख्स का नाम बताएं जो स्वर्ग की बजाय नरक गया हो।
6. किसी ऐसे प्राणी का नाम बताएं जो मौत से कभी न घबराता हो।
सादर...यमदूत
Monday, October 12, 2009
हम क्या कर रहे नहीं पता
Friday, October 9, 2009
यह नोबेल पुरस्कार बला क्या है
Monday, October 5, 2009
योग्यता जितना घमण्ड तो होना ही चाहिए
Saturday, October 3, 2009
Sunday, September 27, 2009
रावण का दहन एक दिन पहले
Sunday, September 20, 2009
विश्व अलजाइमर्स दिवस आज
ठहाके लगाना तो दूर, हंसना भी भूल गए
Saturday, September 19, 2009
मेरा बेटा भी बहुत शरारती है
Wednesday, September 16, 2009
मैं गांधी तो नहीं
Sunday, September 13, 2009
वह तो सिर्फ जेबतराश बाकि तो लुटेरे हैं
Saturday, September 12, 2009
ईश्वर है या नहीं इसमें नहीं उलझे, बस विश्वास करें
'हे परमपिता, यद्यपि मैने आज तक आपको पुस्तकों, संतों एवं शास्त्रों तथा वचनों के माध्यम से जाना है, किन्तु आपकी व्यक्तिगत अनुभूति नहीं की। मेरे मन की अभिलाषा है कि आपको आपके वास्तविक रूप में अनुभूत कर सकूं। हे पिता शीघ्र ही मुझे अनुभूति कराएं।'
Friday, September 11, 2009
कड़की में काम आते टोटके
यूं टोटकों के बारे में हर आम-ओ-खास को जानकारी रहती है। हर कोई बचना चाहता है इनसे। न जाने क्या अला बला पीछे लग जाए। खासकर चौराहों पर तो बड़े ध्यान से निकलना पड़ता है। उस पर रात हो तो ये टोटके किसी भूत पिशाच से कम नहीं लगते। दूर से नजर पड़ जाए तो रास्ता बदल लेने से गुरेज नहीं करते लोग। बहरहाल हम यहां टोटकों का परिचय कराने के मूड में नहीं हैं। हम तो बस इतना बताना चाहते हैं टोटके औरों के लिए भले ही बुरे-भले होते हो लेकिन हमारे लिए तो कड़की के दिनों में बड़े लाभकारी साबित हुए हैं।टोटके लाभकारी कैसे बने इसकी दास्तां भी कुछ कम रोचक नहीं हैं। हमें यह नुस्खा करीब दस-बार साल पहले विरासत में मिला था। लिहाजा इसे आगे बढ़ाने का प्रयास भर कर रहे हैं। बात तब कि है जब हम कॉलेज के दिनों में पढ़ाई के साथ-साथ एक ट्रेडिल पर छपने वाले वाले छोटे से अखबार के लिए भी काम किया करते थे। तनख्वाह के नाम पर कभी कभार बख्शीस की तरह जेब खर्च मिल जाया करता था। ऐसा नहीं है कि सीनियर्स कोई मोटी तनख्वाह पाते हों, उनकी भी हालत काम चलाऊ से ज्यादा हमे कभी नजर नहीं आई। हमेशा की तरह गर्मी की एक रात सीनियर्स गपशप में मशगूल थे। तभी किसी ने शिकंजी की बात छेड़ दी। बात-बात में सभी का मन हो आया कि आज शिकंजी ही पिएंगे। रात के बारह बज रहे हैं ऐसे में शिकंजी कहां मिलने वाली। तभी हमें एक सीनियर साथी ने कहा जाओ जरा आस-पास के चौराहों का फेरा लगा आओ। देखना कहीं टोटके रखे हो तो उलट पलट कर उन्हें देख लेना। एकआध नींबू तो मिल ही जाएगा। टोटके का नाम सुनते ही हमारे रोंगटे खड़े हो गए। पर क्या करें बड़ों का आदेश मानना ही था, एक और जूनियर साथ को साथ लेकर चल दिए टोटकों की खोज में। पहले एक चौराहे पहुंचे, टोटके को देखते ही घिग्घी बंध गई। जैसे तैसे टोटके को टटोला तो उसमें लाल कपड़े में बंधे दो नींबू साथ ही सवा रुपए भी मिल गए। लौटे तो सीनियर्स ने पूछा नींबू लाए हो। हमारा जवाब हां में था। उन्होंने नींबू निचोड़े और शिकंजी तैयार। बस उस दिन की घटना ने हमारे भाग्य जगा दिए। गर्मी में रात बिरात कभी शिकंजी की जरूरत हो तो चौराहे सलामत। चाय के लिए जेब में चव्वनी न हो तो चौराहों का फेरा।
Thursday, September 10, 2009
दिल्ली के रामलीला वालों से हमदर्दी
भई हमें तो दिल्ली की कांग्रेस सरकार के नए फरमान में भी राजनीति की बू आने लगी है। सत्ता पर काबिज सरकार शायद यह नहीं चाहती की रामलीला के नाम पर लोग राम को याद करें। राम का नाम पूरे नौ दिन तक लोगों की जुबां पर होगा तो इसका लाभ प्रतिपक्षी पार्टी को मिलता है। इससे राजनीतिक वातावरण में राम समर्थकों की पार्टी की रेंटिंग बढ़ जाती है। प्रतिपक्षी पार्टी के नेता फीता काटने के बहाने ही अपना जनाधार बढ़ाने के लिए वहां पहुंच जाते हैं। यह स्थिति सत्ताधारी पार्टी के लिए किसी हाजमा खराब करने से कम नहीं होती। उसका बस चलता तो वह तो पूरी रामलीला ही प्रतिबंधित कर देती। यानी कि न रहे बांस न बजे बांसुरी। संभल जाओ रामलीला वालों! अभी पहला तीर चला है। आगे-आगे देखो होता है क्या। दिल्ली वालों मुझे आपसे से पूरी हमदर्दी है। हो भी क्यो नहीं, जीवन के करीब 18 महीने मैने भी दिल्ली में बिताए हैं। मेरे योग्य सेवा हो तो बताना। रामजी आपकी भली करें।




