Sunday, September 27, 2009

रावण का दहन एक दिन पहले

देशभर में भले ही दशहरे पर रावण दहन होता हो, लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर में पंजाबी ङ्क्षहदू समाज एक दिन पहले ही दशहरा पर्व मनाता है। इसी दिन रावण व कुभकर्ण के पुतलों का दहन कर दिया जाता है। पिछले ५९ साल से एक दिन पहले दशहरा मनाने की यह परम्परा कायम है। इस बार रावण का पुतला पचास फीट ऊंचा बनाया गया।

Sunday, September 20, 2009

विश्व अलजाइमर्स दिवस आज

भारत में बुजुर्र्गों को होने वाले अलजाइमर्स रोग से पीडि़तों की संख्या ङ्क्षचताजनक रूप से ३० लाख के आसपास पहुंच गई है और वर्ष २०२० तक पूरे विश्व में इसके रोगियों की संख्या के ३ करोड़ तक पहुंच जाने की आशंका है। चिकित्सकों के अनुसार इस बीमारी के लक्षणों में यादाश्त की कमी होना, निर्णय न ले पाना, बोलने में दिक्कत आना शामिल है। रक्तचाप, मधुमेह, आधुनिक जीवनशैली और सिर में कई बार चोट लग जाने से इस बीमारी के होने की आशंका बढ़ जाती है। अमूमन ६० वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थाई इलाज नहीं है। हालांकि बीमारी के शुरुआती दौर में नियमित जांच और इलाज से इस पर काबू पाया जा सकता है। मष्तिष्क के स्नायुओं के क्षरण से रोगियों की बौद्धिक क्षमता और व्यावहारिक लक्षणों पर भी असर पड़ता है। आज यानी 21 सितम्बर को विश्व अलजाइमर्स दिवस मनाने का दिन है। आओ हम अपने बुजुर्र्गों की सार संभाल की शपथ लें उन्हें इस रोग से बचाने की दिशा में एक कदम बढ़ाएं।

ठहाके लगाना तो दूर, हंसना भी भूल गए

इंसान की उम्र जैसे-जैसे ढलान की ओर जाती है उसकी कई आदतों, आचार-व्यवहार व गुणों में परिवर्तन होता जाता है। उम्र की इसी ढलान में खोती जाती है उसकी खुशी। यूं कहने को तो कभी कभार चेहरा खिला और होठों पर मुस्कुराहट का आभास नजर आ जाता है। लेकिन इस सबमें नैसर्गिगता की बजाय कृत्रिमता का प्रतिशत बढ़ जाता है। गाहे बगाहे ठहाके लगाना तो दूर की बात रही खिलखिलाकर कर हंसना भी वह भूल सा गया है। कभी हंसते-हंसते पेट में बल पड़ जाया करते थे वे दिन अब लद गए। अब तो ठहाके के लिए भी प्रशिक्षण केन्द्रों में जाकर अभ्यास की जरूरत पडऩे लगी है। हम भी हंसना भूल ही गए थे, लेकिन आज जमकर हंसे, मन तो ठहाके लगाने का था पर शरीर ने साथ नहीं दिया। पेट और सीने में दर्द होने लगा। हंसी थमी तो फिर उसी नीरसता के वातावरण में खुद को पाया।

Saturday, September 19, 2009

मेरा बेटा भी बहुत शरारती है

बच्चों की शरारत पर बड़ों का खफा होना लाजमी है। लेकिन इसके साथ बड़ों को यह भी सोचना होगा कि वे बड़े हैं इसलिए उन्हें खफा होने का यह अधिकार नहीं मिल गया। बच्चों की छोटी-बड़ी बातों पर हाथ उठा देना, डांटना या अन्य कोई सजा देना किसी भी लिहाज से उचित नहीं। बच्चे जो कुछ भी करते हैं वह उनकी तात्कालिक परिस्थिति, अर्जित ज्ञान व अधिकार पर निर्भर करता है। इसे लिए एक उदाहरण हैं... कई बार घर में मेहमान आए हुए हों, आप उनसे बात में व्यस्त रहें, इसी बीच बच्चा कोई सवाल बार-बार आपसे कर रहा है तो खीज आना स्वाभाविक है। लेकिन तब आप यह भूल जाते हैं कि बच्चे के लिए मेहमानों का आना उतना विशेष नहीं होता जितना आपके लिए। लिहाजा बदलना आपको होगा। बच्चा जिस अधिकार के साथ आपके पास आता है उसी जिम्मेदारी के साथ उसकी बात का जवाब देना जरूरी है। चाहे इसके लिए कुछ पल मेहमानों पर से ध्यान हटाना ही क्यों न पड़े। इसी तरह कई बार आप कोई फिल्म देख रहे हों उसी दौरान बच्चा शोर कर रहा हो तो उसे डांटे नहीं। उसे नहीं मालूम की फिल्म कोई मनोरंजन की चीज है। उसे तो शोर करने में ही ज्यादा मनोरंजन का अहसास हो रहा होता है। इस हालात में सेक्रीफाइज आपको ही करना है। न कि बच्चे को डांट कर दबाने का प्रयास करें। समय-समय पर बच्चों की स्कूलिंग के जरिए ही हम उनके आचार-व्यवहार में बदलाव ला सकते हैं, उसे समझा सकते हैं। कोई जोर आजमाईश करने से बच्चा जिद्दी हो सकता है। इसलिए बच्चों की मनावृत्ति को समझे, पढ़े, जाने और उसके अनुरूप ही कदम उठाए। यह मेरा सुझाव है। क्योंकि मैं भी एक पिता हूं। मेरा नन्हा बेटा भी बहुत शरारती है।

Wednesday, September 16, 2009

मैं गांधी तो नहीं

'करे कोई भरे कोई' सांसारिक जीवन में इस हालात से हर वह शख्स गुजरा होगा जिसने सदैव दूसरों के प्रति सहृदता रखी होगी। बाद में परिणामों ने आईना भी दिखा दिया होगा कि उसने कितनी बड़ी भूल की। लेकिन आदमी की फितरत को बदला नहीं जा सकता। इसी सहृयता के एक बुरे परिणाम से हाल ही मेरा भी सामना हो गया। यूं कह सकते हैं दूध से जल गया अब छाछ भी फूंक-फंूक कर पीने को जी चाहता है। सहृदता छोड़ पाऊंगा इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकता। लेकिन मैं गांधी भी नहीं कि कोई गाल पर एक थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर दें। गांधीजी वाकई बड़े दिल वाले थे। काश मेरा दिल भी उतना बड़ा हो जाए। बहरहाल जिस गलती के चलते मुझे जिल्लत उठानी पड़ी उसके लिए मैं स्वयं को कतई जिम्मेदार नहीं मानता, खुद गलत नहीं था, बस यही बात मेरा मनोबल बनाए हुए हैं। काश मैं हनुमान होता तो दिल चीर कर दिखा देता।

Sunday, September 13, 2009

वह तो सिर्फ जेबतराश बाकि तो लुटेरे हैं

यह वाक्या रविवार रात करीब तीन बजे का है। चाय पीने के लिए कार्यालय के सामने स्थित बच्चों के सरकारी अस्पताल की केंटिन तक गए थे। परिसर के भीतर प्रवेश किया ही था कि शोर सुनाई दिया। पकड़ो, पकड़ो भागने न पाए। आस-पास सोए लोग भी जग गए। पकड़ लिया गया वो बेचारा। टूट पड़े कई लोग उस पर। जेब से कुछ रुपए भी निकल आए। वह कोई और नहीं, एक जेबतराश था जो रात के सन्नाटे में शिकार पर हाथ साफ करता था। इस सबके बीच एक बात हमें अलहदा नजर आई। जेबतराश की जेब से रुपए भले ही कुल जमा तीन-चार सौ निकले हों, लेकिन यह चिल्लाने वाले कि मेरी भी जेब से रुपए गायब है कहने वाले बीसियों हो गए। कोई बोला पांच सौ तो कोई हजार के पार बताने लगा। हम समझ नहीं पा रहे थे कि जेबतराश तराश के पास कुल जमा तीन चार सौ रुपए निकले तो बाकि लोगों के रुपओं पर किसने हाथ साफ कर दिया। खैर हम आगे बढ़ गए। चाय कि दो चार चुस्की ही ली थी कि इसी बीच पास की कुर्सी पर आकर दो सज्जन बैठ गए। वे आपस में कुछ बतिया रहे थे। पहले तो हमरा ध्यान उनकी तरफ नहीं गया लेकिन जैसे ही जेबतराश वाली घटना उनकी जुबां पर आई हमारे कान खड़े हो गए। उनमें से एक बोल रहा था, अरे यार उसकी जेब से माल ही कम निकला नहीं तो हमारे भी वारे-न्यारे हो जाते। हल्ला सुनकर पहुंचने में कुछ देरी हो गई थी। बस! माजरा हमारी समझ में आ गया। वो बेचारा तो एक जेबतराश था, भीड़ में कई ऐसे सफेदपोश शामिल थे, जो जेब सलामत होने के बावजूद जेब कटने का शोर मचाने में आगे थे। उन्हें आशा थी कि जेबतराश से बरामद रुपओं में से उनके हाथ भी कुछ लग जाता। बहरहाल जेबतराश भी यह सोच रहा होगा कि जब उसने इतने लोगों की जेब ही साफ नहीं की तो फिर कौन यह कारनामा कर गया। आज तो उसके अलावा और कोई साथी यहां नहीं आने वाला था।

Saturday, September 12, 2009

ईश्वर है या नहीं इसमें नहीं उलझे, बस विश्वास करें

ईश्वर को लेकर इस सांसारिक जगत में लोगों के अपने निजी अनुभव, विचार, मत, दावे व सोच है। मैने भी इस सत्य को जानने का प्रयास किया। कितना सफल हो सका यह मै खुद नहीं जानता। प्रयास जारी है। ईश्वर के बारे में चर्चा के दौरान ही एक बार एक शख्स ने मुझे एक रामबाण औषधि रूपी बात कह दी। वह बात सभी तक पहुंचाने की जिज्ञासा बनी रहती है। इसी क्रम में आज आप लोगों को भी बता दूं कि वह रामबाण क्या था। यानी ईश्वर पर उस तरह विश्वास करो जिस तरह एक अबोध बालक मां पर करता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। तीसरी मंजिल की छत से एक मां अपने नवजात को हाथ से पकड़ कर नीचे की ओर लटकाए हुए थी। आप और हम को यदि कोई इससे भी कम ऊंचाई से नीचे झांकनेभर को कह दे तो शरीर में सिरहन दौड़ जाती है। लेकिन वह नवजात नीचे लटके हुए भी मुस्कुराता रहता है। उसे नीचे गिरने का खौफ नहीं होता। उसे विश्वास है मां के चलते मुझे कोई डर नहीं। ठीक उसी तरह ईश्वर पर विश्वास करो। हर भय, राग, द्वेष मिट जाएगा। उसकी सत्ता को माने या ना माने लेकिन उसके होने का अहसास भर भी हमें इस सांसारिक जगत में उत्तम व वैभवपूर्ण जीवन बिताने में सहायक सिद्ध होगा। अब बात यह आती है कि ईश्वर के प्रति लगन कैसे लगाई जाए तो इसके लिए उसी भद्र व्यक्ति का दिया फार्मूला आपके बीच बांटना चाहता हूं जो इस तरह है।
'हे परमपिता, यद्यपि मैने आज तक आपको पुस्तकों, संतों एवं शास्त्रों तथा वचनों के माध्यम से जाना है, किन्तु आपकी व्यक्तिगत अनुभूति नहीं की। मेरे मन की अभिलाषा है कि आपको आपके वास्तविक रूप में अनुभूत कर सकूं। हे पिता शीघ्र ही मुझे अनुभूति कराएं।'

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